बाबा टांगीनाथ-- एक अनुभूति

   बाबा टांगीनाथ--एक अनुभूति 

              महादेव जो आदि और अनंत हैं जो हर जगह यहां वहां सर्वत्र हैं, जो करुणा के सागर हैं और भोले स्वभाव के भंडार हैं ऐसे महादेव की प्रेम से मात्र नाम स्मरण करने से मन में अनंत आनंद की अनुभूति होती है, देवा के देव महादेव कैलाश पर्वत के साथ उन जगहों पर भी विराजमान हैं जहां उनके भक्त निवासरत है, भगवान शंकर जिनके नाम से रोम रोम पुल्कित हो उठता है।  यदि इंसान उनके सानिध्य मे रहे तो अनंत आनंद की अनुभूति होती है। आध्यात्मिक की ओर मन स्वतः चला जाता है, ऐसे ही एक स्थल है बाबा टांगीनाथ जिसके बारे में जानकारी होने पर मन वहां जाने को लालायित हो उठा और महाशिवरात्रि जिसमें शिवजी की आराधना में भक्त डुबे रहते हैं, इसी दिन समय में मैं और मेरे मित्र के साथ अपने निवास पर से मैं वहां निकल पड़ा हमने अपना बाइक द्वारा सन्ना  तहसील मुख्यालय से (जशपुर जिला) बाबा टांगीनाथ के लिए निकल पडे। सन्ना से हम लोग डुमरकोना, उकई  होकर भवानीपुर में मुख्य सडक मार्ग पर पहुंचे। हम लोगो का मन पहाड क्षेत्र अदभुत सुंदरता और खुबसूरत नागिन की तरह बलखाती सडक रास्तों पर ध्यान ना रह कर बाबा टांगीनाथ के निवास के अदभुत नजारा और चरणो की वंदना को आतुर थी। मुख्य सडक मार्ग कुसमी सिरकोट से होते हुए बाबा टांगीनाथ के चरण कमलों में पहुंचे।
          वहां मुझे नही पता था कि भगवान शिव मेरे लिए एक उपहार भी देने को तैयार थे, और वह उपहार था मेरे परम मित्र संतोष कुमार भगत। जो भगवान की सेवा में लिप्त थे, इनसे 3 वर्ष बाद उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हम लोगो के पुजा अर्चना के बाद परम मित्र से कुशलक्षेम हुआ। पता चला कि वे इस पर अपना शोध कर रहे हैं और झारखंड राज्य के बेडो में वरीय शोधार्थी सह सहायक प्रध्यापक करमचंद भगत कॉलेज, बेड़ो में कार्यरत हैं। उन्होंने बाबा टांगीनाथ पर अपने रिसर्च का पिटारा खोला और बहुत सी बात को बताये और कुछ ऐसी बात बतायी जिससे हम लोग अनभिज्ञ थे,लोगो से बात किये उनसे भी कुछ बातो का जानकारी हुआ।

    


*बाबा टांगीनाथ ऐतिहासिक स्थल -*
          बाबा टांगीनाथ एक ऐतिहासिक स्थल भी है। मध्यकालीन  युग के पूर्व से ही इस स्थान का महता चारों ओर है। यहां के निवासरत लोगों के अनुसार यहां छोटा नागपुर के राजा नागवंशी राजाओ का राज्य था, और ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के बारे में भी इतिहास के पन्नों में लिखा गया है। इसका क्षेत्रफल के बारे में बात किया जाय तो यह लगभग 10000 - 10200 वर्ग मीटर में फैला है। तथा यह क्षेत्र (बाबा टांगीनाथ) 300- 350 फीट ऊपर है। टांगीनाथ छोटानागपुर का पठार मे स्थित है, इसलिए यहां हर ओर हरे भरे वन हैं।
यहां पर अनेक देवी देवता की बहुत ज्यादा मात्रा में मूर्तियां है जिसमें भगवान विष्णु सुर्य लक्ष्मी की मूर्तियां है। यहां कुछ मुर्तिया ऐसे हैं जिन्हें देख कर लगता है, कि वे भगवान बुद्ध की है। यहां कुछ मंदिर और प्राचीन निर्माण कार्य है वे 563 ईसा पूर्व और 483 ईसा पूर्व समय का हैं। गुमला जिला के डुमरी क्षेत्र में लुचुत पाठ के पहाड़ पर बहुत सारे शिवलिंग और अनेक देवी देवता की मुर्तिया हैं। कुछ मुर्तिया ऐसे भी है जिसकी पहचान नही हो पायी है।
     हमारे मित्र श्री संतोष भगत ने बताया कि यह  टांगीनाथ धाम को जहांगीर के सुबेदार सिपहसालार अब्राहम खान ने जो इस क्षेत्र का देखरेख करता था। अपने उद्देश्य ( धन धान्य को लुटना , संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करना ) के अनुसार यहां के राजा को हराने के बाद इस क्षेत्र के धन धान्य को बरबरता के साथ लुटा। साथ ही यहां के लोगो के मानसिक अपमान के लिए सांस्कृतिक, धार्मिक धरोहरों को तोडफोड किया जिसमें बाबा टांगीनाथ धाम भी अछुता ना रहा।

*पौराणिक स्थल- भगवान परशुराम के सानिध्य स्थल--* बताया जाता है कि किसी कारणवश भगवान शिव रुष्ट हो गए और अपने त्रिशूल को बाबा टांगीनाथ (इस समय इसका नाम टांगीनाथ नही था) के पहाडो पर  फेंका जिससे इस स्थान उनका  त्रिशूल आ धंसा, और त्रिशूल का अग्र भाग ऊपर रह गया और निचला हिस्सा जमीन की नीचे धंस गया। वहां लोगों ने बताया इस त्रिशूल में कभी भी जंग नही लगता है। टांगीनाथ धाम के रहस्य जानने के लिए खुदाई की गई, जिससे बहुमूल्य आभूषण धन की प्राप्ति हुई, बाबा टांगीनाथ नाथ धाम में ही मां भगवती का भी स्थल है जहां बलि दी जाती है। टांगीनाथ के समीप ही एक झरना है जो वातावरण को और भी मनोरम बना देते है।

  


            यहां कुछ रोचक जानकारी भी मिलती है कि यहां के कुछ लोहार जाति के लोग वहां मौजूद फरसा को लोहा प्राप्त करने के उद्देश्य से काटने का प्रयास किए। किन्तु वे यहां लोहा को नहीं काट पाए और उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के भय से लोहार जाति के लोग इस स्थान को छोड़कर चले गए। और आज भी इसी वजह से इस जाति के लोग टांगीनाथ क्षेत्र के लगभग 15--20 किलोमीटर क्षेत्र और निवास नहीं करते हैं।
                           यहां निवासरत लोगो के अनुसार भगवान बताया जाता है कि भगवान परशुराम श्री राम की विवाह के बाद इस वन से घनघोर क्षेत्र में भगवान शिव की स्थापना की और  तपस्या की थी। इस क्षेत्र के लोग भगवान परसु राम के शस्त्र फरसा को टांगी कहते है जिससे इस क्षेत्र का नाम बाबा टांगीनाथ पडा । बाबा टांगीनाथ धाम में बाबा भोलेनाथ के दर्शन हेतू प्रति वर्ष झारखंड छत्तीसगढ़ के लोग महा शिवरात्रि में आते हैं और भगवान शिव की पूजा करते ,इस समय यहां बहुत बडा मेला भी लगता है।
  *बाबा टांगीनाथ जाने का रास्ता*-- झारखण्ड राज्य के गुमला जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर दूर डुमरी विकासखण्ड(प्रखंड) में लुचुतपाठ के पहाडियों पर बाबा टांगीनाथ है। यहां पहुंचना कठिनाइयों का सामना करना पडता है। 

                     हम वहां से 4 बजे टांगीनाथ से वापसी हेतू तैयारी किये, मन में सुकून और आनन्दित था, युं लगा कैसे महादेव के चरणों को छोड कर जाऊं, पर आना तो था ही महाशिवरात्रि का मेला से और सन्ना पाठ क्षेत्र का ठंड, ठंड भी ऐसा कि सर्द लहर चल रहा है,और हम बाईक में थे लग रहा है हड्डियों में ठंड ना घुस पर इससे ज्यादा इस बात का मन में खुशी था कि महाकाल के रुप टांगीनाथ के सानिध्य में कुछ समय बिताने का समय मिला, युं लगा अगर मन में सुकुन है तो महादेव के भक्ति पर।
                  
                                   *रामकुमार तिवारी*
                                *सन्ना जशपुर छत्तीसगढ़*

    


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