महादेव स्थल- कैलाश गुफा
महादेव स्थल-कैलाश गुफा
मां खुडिया रानी के आंचल को अनेक दर्शनीय स्थल और जलप्रपात सुशोभित कर रहे हैं। जिनमें मां खुडिया रानी का दर्शनीय स्थल, मकरभंजा जलप्रपात, दनगरी जलप्रपात, गूल्लूफाल (मनोरा ब्लॉक), कैलाश गुफा, *कोचाकोना महादेव स्थल,प्राचिन गुफा* और पाठ क्षेत्र का मनोरम दृश्य है। जिनमें से एक है कैलाश गुफा । कैलाश गुफा श्री रामेश्वर गहिरा गुरु का तपोस्थली है इस जगह पर वे तपस्या किये थे और यह गुफा तपोभूमि बन गया है।
कैलाश गुफा में श्री गहिरा गुरू ने शिवलिंग की स्थापना की है। महादेव , देवो के देव महादेव जिनके मस्तक लम्बी जटाओं से अलंकृत है माँ गंगा का शोभायमान हैं, तो वहीं है माथे पर विराजमान चंद्रदेव शीतलमय प्रकाश से शीतलता बिखेर रहे है, जिनके हाथों में दिव्य शस्त्र है जो पापियों का संहार का प्रतीक है, महादेव प्रकृति प्रेमी जिनका निवास सदा पहाड़,पर्वत के गुफाओं कन्दराओं में रहते है। वे दिगंबर है, भस्म उनके शरीर के शोभा को बढाये रहती हैं और भस्म अपने भाग्य को खुशनसीब मान रहा है। उन महादेव का स्थल है यह कैलाश गुफा । कैलाश गुफा जिसमें उंचाई से गिरता जलप्रपात है, जिसका सुमधुर आवाज किसी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। और जब झरने के समीप जातें हैं तो सुन्दरता मन को मोह लेता है। समीप ही महादेव विराजमान हो तों इस जगह का सुन्दरता 100 गुना बढ जाता है। और मन लालायित हो उठता है झरनों के स्वच्छ जल से देवों के महादेव को जलाभिषेक करना।और करे भी क्यों नही वे निराकार परमात्मा रुप में सामने हैं।
कैलाश गुफा में महादेव के जलाभिषेक के लिए बहुत दुर दुर से लोग आते है। सावन के माह में अम्बिकापुर से कैलाश गुफा एवं बगीचा से कैलाश गुफा मार्गपर बोलबम और हर हर महादेव का प्राणदायक स्वर गुंजायमान रहता है। कैलाश गुफा मां खुडिया रानी के हृदयस्थल सन्ना नवीन तहसील से (पन्ड्रापाठ, चुंदापाठ, होते हुए) लगभग 45-50 किलोमीटर की दुरी पर है। और बगीचा से लगभग मुख्य सडक मार्ग से लगभग 30-35 किलोमीटर दुर है।कैलाश गुफा प्राचीन काल से स्थित है किंतु प्राचीन काल के समय में यहां घनघोर जंगल और जंगली जीव हुआ करते था जिससे यह जगह में कोई नहीं जानता था, बताया जाता है कि इस गुफा में जंगली जानवर शेर हुआ करते थे। 1985 के लगभग में श्री रामेश्वर गहिरा गुरु ने इस गूफाा की खोज की और यहां पर अपनी तपस्या की । कैलाश गुफा के बारे में बताया जाता है कि पहले या गुफा सकरा था, किन्तु श्री गहिरा गुरु जी के और स्थानीय लोगों के मदद से 28 दिन में इसे चौड़ा किया गया, यह भी बताया जाता है कि गुफा में छैनी की मदद से पत्थर को नहीं काटा जा सकता था, श्री गहिरा गुरु जी ने अपने तपोबल से उसे काटा। और दो शिवलिंग की स्थापना की। एक गुफा के ऊपर जिसे बुढा महादेव (बुढा शिवलिंग) कहा जाता है और दूसरा गुफा के अंदर शिवलिंग की स्थापना की, गुफा के अंदर जहां पर गहिरा गुरु जी ने तपस्या की थी वही शिवलिंग की स्थापना किया गया है। इस गुफा के ऊपर से आश्चर्यजनक साल भर पानी की धारा बहता है, जबकि गुफा के ऊपर पानी का कोई स्रोत नहीं है।श्री गहिरा गुरु जी कैलाश गुफा में गंगा जी की भी स्थापना की है, कारण यहां के गरीब आदिवासी और अन्य जन लोग अपने पाप निवारण हेतु या कार्य हेतु गंगा स्थान नहीं जा पाते थे। यहां पर अंत्येष्टि संस्कार, मुंडन संस्कार,और अस्थि विसर्जन भी किया जाता है यहां का पानी गंगा की तरह शुद्ध होता है और बहुत दिन रखा जाने पर भी खराब नहीं है।
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| गुफा के अंदर जाने का रास्ता |
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| बुढा शिवलिंग |
कैलाश गुफा पहले जंगलों के मध्य था , जिसमें संत श्री रामेश्वर गहीरा गुरु ने तपोवन बना दिया है। वनवासियों के आराध्य संत गहीरा गुरुजी का जन्म रायगढ जिले के लैलुंगा विकासखंड के ग्राम गहीरा में एक कंवर परिवार में 1905 श्रावन अमावस्या को हुआ था। बाल्यावस्था में ही गुरुजी अलौकिक शक्ति की ओर चुम्बक के समान आकर्षित थे। इनका मानना था गृहस्थ जीवन में रहकर भी लोक कल्याण के लिए सार्थक तपस्या की जा सकती है श्री गहिरा जी ने अपने कार्य से कर दिखाया कि ईश्वर की उपासना धर्म और सद्ज्ञान से पिछडे समाज में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाया जा सकता है । जनजाति क्षेत्र के घोर पिछड़ेपन और अनेक कुप्रथाओं को मिटाने के लिए आदिवासियों को शांति, सद्भाव, सेवा, सदविचार और प्रेम की ज्योति जगाई। इनका मानना था कि उनके पिछड़ेपन का प्रमुख कारण मदिरापान अतः इसे त्याग उन्हें संस्कार देने की आवश्यकता है। जशपुर जिला के अलावा सरगुजा/ रायगढ़/ कोरबा/ बिलासपुर और समीप राज्य झारखंड के जिलों में भी आदिवासी जनजातियों में आश्चर्य जनक सुधार आया। सन 1943 में सनातन संत समाज संस्था की स्थापना की। इसके बाद शिक्षा और संस्कार के लिए संस्कृत पाठशाला, आश्रम संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की। श्रीकोट में भी इनका स्थापना किया हुआ शिक्षा स्थान है।
*रामकुमार तिवारी "कुमार"*
सन्ना जशपुर






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